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भारत का प्राचीन वैभव

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2500 वर्षों के भारत का इतिहास की यात्रा पर ले चलता हूँ कितुं उससे पहले हम भारत को ही जान लेते है आखिर भारत क्या है आम तौर पर भारत को उसकी धार्मिक और आध्यात्मिक विरासत के लिए जाना जाता है ,वैसे तो भारत की भूमि से कई धर्म निकले हिँदू, बौद्व, जैन, सिख कितुं ये सभी धर्म मूल रूप में एक ही नीव पर टिके है और वह है सहिष्णुता और मानवता का विचार । तो हम इसी आधार पर भारत के विस्तार को देखते है यानि हम राजनैतिक भारत को नही बल्कि प्राचीन भारत को उसकी संस्कृति विरासत के आधार पर देखगें। मौर्य काल - मैप में आप इसके विस्तार को देख सकते है ,कुछ लोग मौर्य काल को सिर्फ बौद्व धर्म से अज्ञानता वश देखते है जबकि सच यह है पूरे मौर्य काल मे राज काज की सभी परम्पराए हिंदू थी कितुं राज तत्कालीन प्रभावी धार्मिक गुरुओं में जो उन्हें प्रभावित करता था उसके अनुसार चलते थे जैसे चन्द्रगुप्त मौर्य जैन धर्म को बिंदुसार आजीवक को तो अशोक बौद्व धर्म को निजी जीवन मे मानता था।

दीवाली की अनंत शुभकामनाएं

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।। न क्रोधो न च मात्सर्य न लोभो ना शुभामति: भवन्ति कृत पुण्यानां भक्तानां सूक्त जापिनाम्।। इस दीपोत्सव पर आशा करते हैं कि राष्ट्रीय एकता का स्वर्णदीप युगों-युगों तक अखंड बना रहे.... हम ग्रहण कर सकें नन्हे-से दीप की कोमल-सी बाती का गहरा-सा संदेश ‍कि बस अंधकार को पराजित करना है और नैतिकता के सौम्य उजास से भर उठना है....

भारत के कृषि वैभव पर विश्व विस्मित होता रहा है (क्रमशः भाग-2)

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 सत्रहवीं ईसवी शताब्दी के फ्रांसॉय बर्नियर बंगालके सन्दर्भ में लिखते हैं सब कालों के अध्येता मिस्र को विश्व की श्रेष्ठतम एवं सर्वाधिक उर्वरा भूमिका गौरव देते रहे हैं। हमारे आधुनिक लेखक भी ऐसा मानते हैं कि मिस्र जैसी प्राकृतिक सम्पदा से सम्पन्न कोई अन्य भूमि नहीं है।  बंगाल की अपनी दो यात्राओं में मैं उस देश के विषय में जो जान पाया हूँ उसके आधार पर मेरा तो यही मत बना है कि मिस्र को दिये जाने वाले गौरव का वास्तविक अधिकारी बंगाल है। बंगाल में धानकी ऐसी प्रचुर उपज होती है कि उससे न केवल पड़ोसी प्रदेशोंकी अपितु सुदूर राज्योंकी आवश्यकताओंका संभरण भी होता है। बंगाल का धान गंगा पर धारा से विपरीत दिशा में पटना तक ले जाया जाता है। समुद्र मार्ग से इसे चोलमण्डल तट के मछलीपत्तनम् एवं अन्य अनेक पत्तनों तक पहुंचाया जाता है। अनेक विदेशी राज्यों में भी प्रधानतः श्रीलंका एवं मालदीव द्वीपों में यहाँका धान पहुँचता है। इसी प्रकार बंगाल में चीनी की भी बहुलता है।  यहाँ को चीनी गोलकोण्डा एवं कर्नाटक प्रदेशो तक जाती है। ... यहाँ के सामान्य लोगोंके मुख्य भोजन में घी - चावल के अतिरिक्त ती

भारत के कृषि वैभव पर विश्व विस्मित होता रहा है (क्रमशः) भाग 1

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प्रथम शताब्दी ईसापूर्व के रोमन आख्याता डियोडोरस सिक्युलस भारत के विषय में लिखते हैं भारत में अनेक विशाल पर्वत हैं जो सब प्रकार के फलवान् वृक्षों से आच्छादित रहते हैं । वहाँ अपूर्व सौंदर्य से युक्त अत्यधिक उर्वर विस्तृत मैदान हैं, जिनमें अनेक नदियाँ प्रवाहित होती हैं ।  भारत की अधिकतर भूमि भलीभाँति सिञ्चित है और उसपर प्रतिवर्ष दो शस्य फलित होते हैं। अन्य अनाजों के अतिरिक्त भारत में सब स्थानों पर मोटे अनाज भी उगते हैं। स्थान - स्थान पर बहती जलधाराओं से इन शस्योंका सिञ्चन होता है। वहाँ बढ़िया दालें और धान भी प्रचुर मात्रा में उगते हैं । भोजनोपयोगी अनेक अन्य पौधे होते हैं। इनमें से अधिकतर मात्र भारत में ही पाये जाते हैं। भारतभूमि पर पशुओं के पोषण के लिये उपयोगी अनेक प्रकार के फल भी प्राप्त होते हैं।  अतः यह प्रामाणिक रूप से कहा जा सकता है कि भारतवर्ष में कभी दुर्भिक्ष नहीं पड़ा और पौष्टिक भोजन का सार्वजनिक अभाव वहाँ कभी नहीं हुआ। चौदहवीं ईसवी शताब्दी के अफ्रीकी इब्नबतूता भारत प्रवास के अपने विवरणों में लिखते हैं शरद्की शस्य एकत्र करने के तुरन्त पश्चात् वे उसी भूमि प
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भारतके कृषि वैभव पर विश्व विस्मित होता रहा है  प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व के रोमन आख्याता डियोडोरस सिक्युलस भारत के विषय में लिखते हैं भारत में अनेक विशाल पर्वत हैं जो सब प्रकार के फलवान् वृक्षों से आच्छादित रहते हैं। वहाँ की अपूर्व सौंदर्य से युक्त अत्यधिक उर्वर विस्तृत मैदान हैं, जिनमें अनेक नदियाँ प्रवाहित होती हैं। भारत की अधिकतर भूमि भली-भाँति सिंचन है और उस पर प्रतिवर्ष दो शस्य फलित होते हैं ।  अन्य अनाजों के अतिरिक्त भारत में सब स्थानों पर मोटे अनाज भी उगते हैं। स्थान - स्थान पर बहती जलधाराओं से इन शस्यों का सिंचन होता है। वहाँ बढ़िया दालें और धान भी प्रचुर मात्रा में उगते है। भोजनोपयोगी अनेक अन्य पौधे होते हैं। इनमें से अधिकतर मात्र भारत में ही पाये जाते हैं। भारत भूमि पर पशुओं के पोषण के लिये उपयोगी अनेक प्रकार के फल भी प्राप्त होते हैं। अतः यह प्रामाणिक रूप से कहा जा सकता है कि भारत वर्षमें कभी दुर्भिक्ष नहीं पड़ा और पौष्टिक भोजन का सार्वजनिक अभाव वहाँ कभी नहीं हुआ।  चौदहवीं ईसवी शताब्दी के अफ्रीकी इब्नबतूता भारत प्रवास के अपने विवरणों में लिखते हैं शरद्क

विपुल कृषि उपज की भूमि

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भारत भूमि को विपुल प्राकृतिक उर्वरता , प्रचुर जल एवं असीम धूप प्राप्त हुई है। भारत के लोगों ने प्रकृति की इस विशिष्ट अनुकम्पा को कृतज्ञता पूर्वक स्वीकार किया है। अत्यन्त प्राचीन काल से ही वे इस प्राकृतिक प्राचुर्य का समुचित नियोजन करने के लिये कृषिके विभिन्न क्षेत्रों में उच्चतम दक्षताएँ विकसित करने को कृतसंकल्प रहे हैं।  चौथी शताब्दी ईसापूर्व के यूनानी योद्धा सिकन्दर से लेकर अठारहवीं ईसवी शताब्दी के प्रायः अन्त के यूरोपीयो तक भारत में आनेवाले प्रायः सब पर्यवेक्षक भारतीय कृषकों की उपज के बाहुल्य को देखकर स्तब्ध होते रहे हैं। हल चलाना , खाद देना , सिञ्चाई करना , बीजों का चयन , शस्यों का आवर्तन , भूमि परती रखना जैसी कृषि - सम्बन्धी समस्त विधाओं में भारतीय कृषकों की परिष्कृत तकनीकों से वे प्रभावित हुए हैं। कृषि के विविध कायाँ के लिये भारत के विभिन्न भागों में विकसित सादे - सरल तथापि पूर्णतः कार्यक्षम उपकरणों ने उन्हें विस्मित किया है।  उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोत प्रमाणित करते हैं कि प्रायः अर्वाचीन काल तक भारतीय विश्व के सर्वोत्तम कृषक रहे हैं। विभिन्न कालों के शिलालेखो

तंजावूर का धर्मराज्य

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अनजान लोगों के भी जो अनाथ बच्चे छत्र में आ पहुँचते हैं , उन सबको शिक्षक को देखभाल में रखा जाता है। उन्हें दिन में तीन समय भोजन दिया जाता है और प्रतिचौथे दिन उनका तेल से अभ्यञ्जन होता है। आवश्यकता पड़ने पर उन्हें औषधि एवं समय - समय पर वस्त्र उपलब्ध करवाये जाते हैं , और उनकी सब प्रकारले समुचित देखभाल करने के सब प्रयास किये जाते हैं।  जिस किसी विद्या में उनको रुचि हो उन्हें उस विद्या में शिक्षा दिलवाई जाती है, और जब वे अपनी रुचिके विषय में पारङ्गत हो जाते हैं तो उनके विवाह का व्यय छन उठाता है। छत्र में पहुँचकर जो यात्री अस्वस्थ हो जाते हैं उनके लिये औषध एवं समुचित अन्नपान का प्रबन्ध किया जाता है और स्वस्थ होने तक सम्मान एवं स्नेहपूर्वक उनकी सेवा - शुश्रूषा की जाती है। शिशुओं के लिये दूध दिया जाता है। गर्भवती महिलाओं की विशेष स्नेहपूर्वक देखभाल की जाती है। उनमें से जिनका गर्भ छन में रहते हुए पूर्ण हो जाता है उनके प्रसव का व्यय छन्त्र उठाता है। उनके लिये समुचित औषधियाँ उपलब्ध करवायी जाती हैं और प्रसव के पश्चात् तीन महीने तक उन्हें छत्र में रहने की अनुमति होती है। तंज